The Prophet by Kahlil Gibran - मसीहा - खलील जिब्रान
Dear Friends
I had been translating " The Prophet " a timeless classic by Kahlil Gibran , published in early twentieth century. I am sharing with you few gems from that translation in Hindi. In 'Prophet' he speaks on various timeless questions about human life like- laws, crime, reason and passion, love, work, beauty, friendship .... 26 topics in total . I am giving few excerpts below. If some of you like it, i may start it from the beginning.
फिर एक अमीर आदमी ने कहा ," हमें दान के बारे में बताओ "
और उसने कहा -
बहुत थोडा देते हैं आप जब आप अपनी जायदाद में से देते हैं।
आप जब स्वयंं को ही देते हैं, तभी देते हैं।
तुम्हारी जायदाद क्या है , वो सारी चीज़ें जिन्हे तुम इस डर में इकट्ठा करते हो , फिर उनकी रक्षा रक्षा करते हो की कहीं भविष्य में कहीं जरुरत न पड़ जाये।
और जरुरत का क्या डर है सिवा जरुरत के।
वो प्यास जो तुम्हारा कुआँ भरा होने से भी बनी रहती है , उसे कौन मिटाएगा।
ऐसे लोग हैं जो अपने बहुत में से थोड़ा सा देते हैं और वो भी इसलिये की उनको सम्मान मिले। उनकी यह दबी हुई इच्छा उनके दान को अपवित्तर कर देती है।
यहां ऐसे भी हैं जिनके पास कम है , लेकिन वो सारा दे देते हैं। यह वो लोग हैं जो जीवन में और जीवन की धन्यता पर विश्वास रखते हैं। इनके खजाने कभी खाली नहीं होते।
यहाँ ऐसे भी हैं जो आंनंद से देते हैं और आनंद ही उनका इनाम है.
और जो दुःख से देते हैं , दुःख ही उनकी दीक्षा है।
जो देने में न ही दुःख का ,न ही आनंद के लिए न ही किसी अछाई को ध्यान में रख कर देते हैं , यह घाटी के उन फूलों की तरह हैं , जो सब ओर अपनी सुगंध बिखेरते हैं। ऐसे लोगों के हाथों से परमात्मा ही देता है ,और धरती की और देख कर खुश होता है।
अच्छा है मांगने पर दिया जाये , पर उससे भी अच्छा है , बिना मांगे अपनी समझ से ही दिया जाये।
और खुले हाथों के लिए देने से भी ज्यादा ख़ुशी है , की कोई लेने वाला है। …
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